अचानक ऐसा क्या हुवा की कोंग्रस के न्रेतत्व मे हमारे सारे मुस्लिम भाइयों को वंदे मातरम् गीत ही गुनाह लगने लगा?
वर्ष 1937 के दौरान कोलकाता में, कांग्रेस कार्य समिति की बैठक में इस राष्ट्रीय गीत में कटौती का
निर्णय लिया गया जिसका एकमात्र उद्देश्य मुसलमानों को खुश करना था, क्योंकि उनके हिसाब से ये गीत उनकी कानून 'Shariyat' के खिलाफ है, इस प्रकार इस गीत का दुर्भाग्य का युग शुरू हुआ! मुसलमान फिर भी संतुष्ट नहीं थे. वे इस गीत को खत्म करना चाहते थे
पूरी तरह 17 मार्च 1938, मुस्लिम लीग के अध्यक्ष बैरिस्टर जिन्ना (वही जिन्ना जिसने भारत के दो टुकड़े करवाए) नें'वंदे मातरम्' के प्रथम छंद पढ़ने पर भी आपत्ति उठाई
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1-कृपया इसके प्रथम छन्द का अर्थ देखे जिसमे केवल भारत की नदियों, पर्वत, रात्रि, प्रातःकाल की ही वंदना करी गयी है,आप लोग बताए क्या इसमे 'Shariyat' के खिलाफ कुछ ऐसा दिख रहा है?
2-क्या ये अचानक हुवा या फिर किसी सोची समझी साजिश के तहत वंदे मातरम् को पूरी तरह से ख़तम करना ही उद्देश्य था?
3-ये लोग वही कर रहे है जो की अँग्रेज़ों ने किया इस गीत पर रोक लगा कर और यही मुहम्मद अली जिन्ना ने करा लेकिन वो आज़ादी और पाकिस्तान बनने के पहले की बात थी
आज ऐसा क्या है जो हिन्दुस्तान मे रह कर हिन्दुस्तान की खाकर हम अपने हिन्दुस्तान की वंदना नही कर सकते? आप को इस गीत कहाँ से धर्म चिन्ह लग रहा है?
4-क्या इस देशगीत को धर्मचिन्ह बोलने की साज़िश जिन्ना/ माउंटबेटोन जैसे लोगों की ही थी जो देश को तोड़ते तोड़ते भी बचे हुए देशभक्त मुस्लिमों और हिंदू लोगों के बीच केवल एक खाई बना कर हमको खोखला करना चाहते थे
5-क्या इस का विरोध करने वाले काले अंग्रज़ों और मुस्लिमों को इंग्लेंड या पाकिस्तान नही चले जाना चाहिए?
जिस हिन्दुस्तान मे रहते हो जिस हिन्दुस्तान की खाते हो उस हिन्दुस्तान की वंदना करना कहाँ से धर्म चिन्ह है क्या ये बात हजम करने योग्य है?......का विरोध करने वालो बताओ की क्या इसका विरोध क्या तुम्हारी गद्दारी का सबुत नहीं है????

अली मियां द्वारा‘ वन्देमातरम्’ के विरोध के कारण भारतीय मुसलमानों को देशद्रोही के रूप में चित्रित किया जा रहा था। जबकि देशद्रोही तो ‘आनन्द मठ’ के लेखक को कहा जाना चाहिए जिसमें अंगे्रज़ों के आगमन पर हर्षित होकर कहा गया कि ‘ अब अंग्रेज़ आ गये हैं, हमारी जान व माल की सुरक्षा होगी।’
ReplyDeleteजिसके कारण डा0 लोहिया ने कहा था कि ‘आनन्द मठ’ उपन्यास हमारे राष्ट्रीय आन्दोलन पर एक कलंक है।
यह कलंक उस बंकिमचन्द्र चटर्जी द्वारा लगाया गया जिसने ‘हाजी मोहसिन फण्ड’ से आर्थिक सहायता पाकर बी. ए. की डिग्री प्राप्त की और वाकार्थ में निपुणता पाते ही मुस्लिम दुश्मनी के प्लॉट पर एक उपन्यास लिख डाला जिसमें नायक भवानन्द महेन्द्र को समझाते हुए कहता है कि जब तक मुसलमानों को निकाल न दिया जाए तब तक तेरा धर्म सुरक्षित नहीं।
‘वन्दे मातरम्’ का अनुवाद, हकीक़त, & नफ़रत की आग बुझाइएः -डा. अनवर जमाल
http://wandematram.blogspot.com/2009/11/vande-matram-islamic-research.html